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नवजातों को ठंड से बचाने में मददगार कंगारू मदर केयर कड़ाके की ठंड में कंगारू की तरह जन्म के बाद भी मां के आंचल से चिपका कर रख रहे बच्चों को

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शहजाद खान शाजापुर। जन्म से बीमारियों से ग्रसित व कमजोर बच्चों को एसएनसीयू में भर्ती किया जाता है। ऐसे में वे मां से दूर हो जाते हैं। किंतु जिला अस्पताल में बीमार बच्चों को मां के साथ ही रखकर उपचार दिया जा रहा है। यह कवायद कंगारू मदद केयर के द्वारा सफल हुई है। इसके लिए जिला अस्पताल में एक विशेष कक्ष तैयार कर उसमें जन्म से कमजोर या बीमारियों से ग्रसित नवजातों को उनकी मां के साथ रखा जाता है। खासतौर पर समय से पहले जन्म या जन्म के बाद सांस लेने में तकलीफ आने वाले बच्चों को यहां रखा जा रहा है। जिला अस्पताल के एसएनसीयू में स्टॉफ का काफी टोटा है, किंतु इसके बावजूद यह नवजातों के लिए जीवनदायक बना हुआ है।
यूनिट के इंचार्ज डॉ. चेतन वर्मा, जो अकेले कर रहे शिशुओं का उपचार
जिला अस्पताल में संचालित कंगारू मदर केयर यूनिट में भर्ती बच्चे की मां के लिए विशेष गाउन पहनाया जाता है। यह कंगारू के शरीर की संरचना की तरह है। इसमें बच्चे को मां के आंचल के पास रखा जाता है। जिससे उसे दुग्धपान में आसानी रहती है। साथ ही मां के शरीर से मिलने वाली गर्मी उसे ठंड से बचाती है। प्रिमेच्योर बच्चे के शरीर के अंग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। शरीर में कम गर्मी होती है। दूध पीने व उसे पचाने में उन्हें काफी तकलीफ होती है। इसके चलते उन्हें विशेष देखभाल की जरूरत होती है। एसएनसीयू में भर्ती बच्चों को अधिकांश समय मां से अलग रखना पड़ता था। इससे निजात के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह रास्ता निकाला गया है। इसके सफल परिणाम देखने को मिले हैं। युनिट में एलईडी स्क्रीन के माध्यम से माताओं को बच्चों को अपने साथ रखने और उनका ध्यान रखने आदि का तरीका बताया जाता है। मां और बच्चे को ठंड से राहत के लिए इलेक्ट्रानिक हीटर के माध्यम से कक्ष का तापमान मेंटेन किया जाता है।
तीन माह में 250 से अधिक को मिला लाभ
एसएनसीयू में एक अक्टूबर से 31 दिसंबर तीन माह की अवधी में 292 बच्चों को भर्ती कराया गया। इनमें से 257 बच्चों को स्वस्थ्य होने के बाद छुट्टी दे दी गई। सात बच्चों की हालत में सुधार नहीं आने के कारण उन्हें रैफर किया गया। जबकि 28 बच्चों की मौत हो गई। इसी अवधी में एक हजार 382 बच्चों को परीक्षण किया गया। यह वह बच्चे हैं जो एसएनसीयू में उपचार लेने के बाद स्वस्थ्य हुए थे। यहां से छुट्टी होने के एक साल बाद तक बच्चों का फॉलोअप चेकअप होता है। जानकारी अनुसार यहां भर्ती होने वाले करीब 85 फीसद बच्चों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है। जबकि 4 फीसद बच्चे रैफर होते हैं और 11 फीसद के करीब की मृत्यु हुई। मृत्यु का औसत स्वास्थ्य विभाग के मानकों के अनुसार ठीक हैए कई अस्पतालों में यह काफी ज्यादा है।
दवा की नहीं जरूरत देखभाल ही इलाज 
एसएनसीयू प्रभारी डॉ. चेतन वर्मा के अनुसार यहां भर्ती होने वाले नवजात बच्चों को आवश्यकता होने पर कंगारू मदर केयर युनिट में रखा जाता है। युनिट में एक समय में चार मा और नवजात को रखने की व्यवस्था है। डॉ. वर्मा के अनुसार प्रिमेच्योर व लो वेट बच्चों को अधिकांशत: देखभाल की ही आवश्यकता होती है। एसएनसीयू में भर्ती किए जाने वाले 60 फीसद से अधिक बच्चों को किसी भी तरह की दवा (एंटिबायोटिक) नहीं दी जाती। यहां सिर्फ उनकी विशेष देखभाल की जाती है। कंगारू युनिट में यह देखभाल और बेहतर हो जाती है। इसका कारण वहां मां और नवजात दोनों का साथ होना है। पिछले तीन माह के रिकार्ड को देखे तो कंगारू मदर केयर युनिट के माध्यम से नवजातों की देखभाल में काफी मदद मिली है।
आवश्यकता चार की, नियुक्ति एक की...
एसएनसीयू यूनिट के सफल संचालन और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए लगातार उनकी निगरानी करना होती है। इसके लिए उक्त यूनिट के लिए कम से कम चार चिकित्सकों की आवश्यकता होती है ताकि रात और दिन में यदि बच्चों को कभी किसी उपचार की जरुरत पड़े तो चिकित्सक वहां मौजूद रहे। 2011 में जब एसएनसीयू की शुरूआत हुई थी तो यहां चार चिकित्सकों की ही नियुक्ति की गई थी, लेकिन वे सभी संविदा पर थे। इनमें से एक शुजालपुर चले गए हैं और तो दो चिकित्सकों ने इस्तीफा दे दिया है, जिसके चलते इस यूनिट का पूरा प्रभार डॉ. चेतन वर्मा पर आ गया है। बावजूद इसके डॉ. वर्मा अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं और चार चिकित्सकों का काम अकेले देख रहे हैं। कभी भी कोई अर्जेंट कॉल आने पर डॉ. वर्मा सबसे पहले अपनी यूनिट पर पहुंचते हैं चाहे फिर समय कुछ भी हो वे यूनिट में भर्ती नवजात बच्चों को पहले तरजीह देते हैं।  

इनका कहना है...
एसएनसीयू व कंगारू मदर केयर युनिट बेहतर कार्य कर रही हैं। यहां से कई गंभीर नवजात भी स्वस्थ्य होकर निकले हैं। इसे और बेहत बनाने के प्रयास कर रहे हैं। कंगारु युनिट में फिलहाल चार बेड लगे हैं, इन्हें भी बढ़ाने की कोशिश की जा रही हैं। 
- डॉ. अनुसूया गवली सिन्हा, सीएमएचओ-शाजापुर

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Shahzad Khan

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