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शाजापुर के निष्ठावान स्वयंसेवक व वरिष्ठ अभिभाषक का निधन- गणमान्यजनों ने बड़ी संख्या में शामिल होकर दी अंतिम विदाई--देखे खबर

 
शहजाद खान शाजापुर (नि.प्र.)। नगर के वरिष्ठ समाजसेवी, अभिभाषक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निष्ठावान वयोवृद्ध स्वयंसेवक एवं दैनिक स्वदेश के पूर्व संचालक मा.मदनलालजी पांडे का 97 वर्ष की आयु में रविवार सुबह स्वर्गवास हो गया। श्री पांडे की अंतिम यात्रा शाम 5 बजे उनके स्वनिवास नईसडक़ से निकाली गई। जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दायित्ववान पदाधिकारी, विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक संगठनों के सदस्य, अभिभाषकगण, समाजसेवी, पत्रकारगण तथा नगर के गणमान्यजनों ने शामिल होकर उन्हें अंतिम विदाई दी। स्थानीय शांतिवन में उनके पुत्र वरिष्ठ अभिभाषक नारायणप्रसाद पांडे ने मुखाग्रि दी तथा अंतिम संस्कार के उपरांत उपस्थितजनों ने श्रद्धांजली अर्पित करते हुए आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से कामना की।
एक निष्ठावान व समर्पित स्वयंसेवक के रूप में जीवन पर्यंत राष्ट्रसेवा को परम ध्येय मानने वाले श्री मदनलालजी पांडे का जन्म 22 फरवरी 1920 को उनके ननिहाल ग्राम गरोठ जिला मंदसोर में हुआ था और उनकी प्राथमिक तथा माध्यमिक शिक्षा गरोठ में ही पूर्ण हुई थी। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट रामपुरा मंदसोर में पूर्ण हुआ। इसके पश्चात बी.ए.की पढ़ाई क्रिश्चियन कॉलेज इंदौर में पूर्ण की तथा एलएल.बी. व एलएल. एम. पूर्ण करने हेतु 1938 में दिल्ली पहुंच गए। इसके उपरांत सनद प्राप्त कर इंदौर आ गए और यहां हजारीलाल जी सांगी के कार्यालय में उन्होंने वकालत का कार्य सीखना शुरू किया। सन् 1945 में स्वतंत्रता आंदोलन 9 अगस्त से प्रारंभ हुआ, जिसमें उन्होंने सक्रियतापूर्वक भाग लिया और वे 9 अगस्त को ही इंदौर में अपने कई साथियों के साथ गिरफ्तार हो गए। 9 से 23 अगस्त 1945 तक सेंट्रल जेल में बंद रहे, इसके पश्चात शाजापुर आ गए और यहां वकालत के साथ-साथ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम भी शुरू कर दिया। वर्ष 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगा और प्रतिबंध हटाओ आंदोलन में सहभागिता के दौरान 6 माह तक जेल में रहे। इसके पश्चात कश्मीर बचाओ आंदोलन शुरू हुआ और शाजापुर में कई साथियों के साथ इस आंदोलन का हिस्सा बनकर भी जेल गए। लगभग 50 साथियों के साथ उन्हें ग्वालियर जेल में रखा गया उसमें भी 1 वर्ष तक जेल में रहे। इसके पश्चात पुन: शाजापुर में संघ और वकालत का काम शुरू कर दिया। स्थानीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने श्री पांडे को कई बार निवेदन किया कि वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पात्रता हेतु फार्म भर दें लेकिन उन्होंने कहा कि मैं देश की सेवा के लिए जेल में गया था, जिसकी एवज में कोई लाभ ले लेना नहीं चाहता। तत्कालिन समय में चंद्रशेखर भट्ट, जमुनालाल शर्मा और रघुनंदन शर्मा जैसे अधिवक्ताओं ने कई बार प्रयास किए कि वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का सरकार से प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेंवे, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। 
24 घंटे में करवा दिया पुल का पुननिर्माण
जनसंघ की स्थापना के पश्चात सन 1952 एवं 1957 में वे शाजापुर से भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े और सन् 52 में केवल 1700 वोट तथा सन 57 में मात्र 900 वोट से चुनाव हार गए। इसके पश्चात कई बार उन्हें टिकट देने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने चुनाव लडऩे से स्पष्ट इंकार कर दिया। सन 1960 से 62 तक वे नगरपालिका शाजापुर के अध्यक्ष भी रहे। इस बीच सन् 1961 में चीलर नदी में भयंकर बाढ़ आई थी, जिससे नगर के दो हिस्सों को जोडऩे वाली महुपुरा रपट का पुल बह गया था, बाढ़ उतरने के तुरंत बाद उन्होंने श्रमदान करवाकर 24 घंटे में ही पुन: रपट का निर्माण करवा दिया, जो कि आज भी यथावत् कायम है। 
भारतीय किसान संघ को बनाया सुदृढ़
आपातकाल के दौरान सन् 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक मिसाबंदी के रूप में जेल में रहे और जनता पार्टी की सरकार बनने के पश्चात भूमि विकास बैंक के अपेक्स बैंक के चेयरमैन बने। सन् 1980 में पुन: भूमि विकास बैंक के चुनाव में वे डायरेक्टर बने। यद्यपि उस समय चेयरमैन कांग्रेस के ताराचंद्र अग्रवाल बने थे, किंतु उनको श्री पांडे पर इतना विश्वास था कि वह अंतिम निर्णय के पूर्व श्री पांडे से विचार-विमर्श अवश्य किया करते थे। इसके पश्चात् सन 1982 से 1986 तक अखिल भारतीय किसान संघ के केंद्रीय उपाध्यक्ष रहे और सन् 1986 में शाजापुर में किसान संघ का सम्मेलन हुआ। जिसमें माननीय दत्तोपंतजी ठेंगड़ी ने मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थिति दर्ज की। उन्होंने श्री पांडे का सार्वजनिक अभिनंदन करते हुए एक लाख रुपए की थैली भेंट की थी, जिसे श्री पांडे ने किसान संघ को सुदृढ़ बनाने में खर्च कर दी। 
प्रथम प्रांतीय शिविर का हुआ आयोजन
वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 1956 में जिला कार्यवाह के रूप में कार्यरत रहे उनके निवेदन पर ही शाजापुर में सन् 1967 में संघ का प्रथम प्रांतीय सम्मेलन 17,18 व 19 नवंबर को आयोजित हुआ। जिसमें संघ के सरसंघचालक परम पूज्यनीय गुरुजी, सत्यमित्रानंदगिरी जी एवं राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया ने भी भाग लिया। शिविर के बाद से ही उन्हें उज्जैन विभाग का कार्यवाह नियुक्त कर दिया गया और इसी दायित्व का निर्वाह करते रहने के आधार पर उन्हें मिसा में 19 महीने तक जेल में रखा गया। जेल से छुटने के बाद लगभग 3 वर्ष तक वे शासकीय अधिवक्ता के रूप में भी कार्यरत रहे और इसी बीच उन्होंने 19 जुलाई 1979 को सरस्वती शिशु मंदिर की शाजापुर में स्थापना कर दी।जिसके शुभारंभ में प्रदेश के शिक्षा मंत्री श्री हरिभाऊ जोशी भी उपस्थित रहे। 
शिक्षा से रहा बेहद लगाव
शिशु मंदिर की स्थापना के बाद प्रति रविवार को वे आचार्यों की क्लास लेते थे तथा आचार्य-दीदी को सिखाते थे कि किस तरह से भैया-बहिनों को संस्कारयुक्त शिक्षा दी जाए। इसके पश्चात वे स्वयं भी स्कूल में कभी-कभी बच्चों को पढ़ाने लग जाते थे, उन्हें शिक्षा से अधिक लगाव था, इसलिए उन्होंने अपने पोते अखिलेश पांडे को शाजापुर में कॉलेज खोलने की प्रेरणा दी, जो आज विक्रम विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पर है। कॉलेज के परिणाम में जो भी विद्यार्थी मेरिट में आता था उन्हें अत्यंत प्रसन्नता होती थी। यही कारण है कि कॉलेज की सफलता को देखते हुए उन्होंने कहा था कि अब मेरे जीवन का उद्देश्य पूर्ण हुआ। 

shahzad Khan

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