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सैकड़ों वर्ष से अमन का पैग़ाम दे रही हज़रत हुसैन की शहादत-नईम क़ुरैशी

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शाजापुर- युद्ध रक्त ही देता है, क़ुर्बानी ही मांगता है, लेकिन धर्म और सत्य के लिए घुटने न टेकने का संदेश भी देता है। लड़ाई का अंत तकलीफ़ ही देता है, बावजूद इसके सैकड़ों वर्ष बाद भी कर्बला के मैदान में हुई जंग अमन और शांति का पैग़ाम दे रही है।*

10 मोहर्रम 61 हिजरी  यानी 10 अक्टूम्बर सन 680 को हज़रत हुसैन रज़ि. को यज़ीद की सेना ने उस वक़्त शहीद कर दिया, जब वे नमाज़ के दौरान सजदे में सर झुकाए हुए थे। पैग़ाम ए इंसानियत को नकारते हुए बादशाह यज़ीद ने इस जंग में 72 लोगों को बेरहमी से क़त्ल कर दिया था, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल थे।

पूरी दुनिया में मोहर्रम माह के दौरान मुस्लिम विशेष इबादत करते हैं और भोजन पानी का दान कर रोज़े भी रखते हैं। हज़रत हुसैन और उनके परिजनों, साथियों का बेरहमी से क़त्ल करने के पूर्व यज़ीद की सेना ने बहुत यातनाएं पहुंचाई थी, तपते रेगिस्तान में पानी की एक बूंद भी इस्लाम धर्म के पैग़म्बर के नवासे को नसीब नही हुई थी। दरिया पर यज़ीदी लश्कर का कड़ा पहरा था, जो पानी लेने गया उसे तीरों से छलनी कर दिया।

भारत मे मोहर्रम के अनूठे रंग हैं, यहां मातम को भी हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। मोहर्रम को जिस शिद्दत से मुसलमान मानते हैं, हिंदू भी उतनी ही आस्था रखते हैं। चौकी स्नान से लेकर दस मोहर्रम को प्रतीकात्मक कर्बला स्थल तक हिन्दू भाईचारे और सदभाव के साथ पूरी आस्था में सराबोर होकर मोहर्रम के प्रतीकों को कांधा देते हैं, जो देश मे धर्मों के आदर के साथ एकता का मज़बूत उदाहरण भी है।

*भारत में ताज़ियादारी*

मुहर्रम कोई त्योहार नहीं है, यह सिर्फ़ इस्लामी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है। पूरी इस्लामी दुनिया में मुहर्रम की नौ और दस तारीख को मुसलमान रोज़े रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत की जाती है। रहा सवाल भारत में ताज़ियादारी का तो यह एक शुद्ध भारतीय परंपरा है। इसकी शुरुआत तैमूर लंग बादशाह ने की थी तैमूर लंग शीआ संप्रदाय से था और मुहर्रम माह में हर साल इराक ज़रूर जाता था। एक बार जब वह नही जा सका तो बादशाह सलामत को ख़ुश करने के लिए दरबारियों ने ऐसा करना चाहा, जिससे तैमूर ख़ुश हो जाए। उस ज़माने के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक़ के कर्बला में बने इमाम हुसैन के रोज़े की प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया। बांस की किमचियों की मदद से ताज़िया तैयार किया गया और फूलों से सजाकर पहली बार 801 हिजरी में तैमूर लंग के महल परिसर में रखा गया था। तुग़लक-तैमूर वंश के बाद मुग़लों ने भी इस परंपरा को जारी रखा।  मुग़ल बादशाह हुमायूं ने सन्‌ नौ हिजरी 962 में बैरम खां से 46 तौला के जमुर्रद, पन्ना,हरित मणी का बना ताज़िया मंगवाया था। तभी से ये परंपरा देश में चली आ रही है।

*हिजरी सन्‌ की शुरुआत*

हिजरी की शुरुआत दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर फ़ारुक़ रज़ि. के दौर में हुई, हज़रत अली रज़ि. की राय से ये तय हुआ था। इस्लाम धर्म के आख़री प्रवर्तक हज़रत मोहम्मद सल्ल. के पवित्र शहर मक्का से मदीना जाने के समय से हिजरी सन को इस्लामी वर्ष का आरंभ माना गया। इसी तरह हज़रत अली रज़ि. और हज़रत उस्मान ग़नी रज़ि. के सुझाव पर ही ख़लीफ़ा हज़रत उमर रज़ि.ने मोहर्रम को हिजरी सन का पहला माह तय कर दिया, तभी से विश्वभर के मुस्लिम मोहर्रम को इस्लामी नव वर्ष की शुरुआत मानते हैं।

*क़ुरआन और हदीस में मोहर्रम का महत्व*

क़ुरआन के पारा नम्बर 10 में सूरह तोबा की आयत नम्बर 36 के मुताबिक़ इस्लाम के बारह माह में मोहर्रम का बड़ा महत्व है। इस पवित्र माह में हज़रत आदम अलेहि सलाम दुनिया में आये, हज़रत नूह अलेहि सलाम की कश्ती को दरिया के तूफ़ान में किनारा मिला, हज़रत मूसा अलेहि सलाम और उनकी क़ौम को फ़िरऔन के लश्कर से निजात मिली और फ़िरऔन दरिया ए नील में समा गया।

*आशूरा का रोज़ा, गुनाहों से निजात*

हदीस मिशकात शरीफ़ के मुताबिक़ पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्ल. ने पैग़ाम दिया कि गुनाहों से निजात के लिए दस मोहर्रम यौमे आशूरा पर रोज़ा रखना चाहिए। हदीस तिरमिज़ी शरीफ़ के मुताबिक़ रमज़ान के रोज़ों के बाद मोहर्रम की दस तारीख़ का रोज़ा बड़ी फ़ज़ीलत रखता है।
लेखक-नईम कुरैशी, (पत्रकार)धार्मिक मामलों के जानकार

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Shahzad Khan

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